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जागेश्वर महादेव: शिव पुराण के अनुसार विश्व में महादेव के प्रथम पूजन का साक्षी है यह धाम”

हरिद्वार उत्तराखंड/27 मार्च 2026

देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण ईश्वरीय सत्ता का प्रमाण है। अल्मोड़ा जिले के दारुकावन (देवदार के घने वन) में स्थित जागेश्वर धाम को लेकर यह मान्यता है कि यहीं से संसार में भगवान शिव के साकार रूप में पूजन की दिव्य परंपरा का आरंभ हुआ था।


​पौराणिक गाथा और ऋषियों की तपस्थली

​पौराणिक ग्रंथों और ‘मानस खंड’ के अनुसार, प्राचीन काल में यहाँ सप्तऋषि कठोर तपस्या में लीन थे। कथा के अनुसार, महादेव यहाँ एक अद्भुत रूप में प्रकट हुए। ऋषियों द्वारा अनजाने में दिए गए एक शाप को स्वीकार करते हुए, भगवान शिव ने अपनी दिव्य सत्ता को इसी धरा पर स्थापित कर दिया।

​जब महादेव की उस अनंत ऊर्जा से सृष्टि में हलचल हुई, तब ब्रह्मा जी के परामर्श पर ऋषियों ने अपनी भूल सुधारते हुए महादेव की स्तुति की। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, माँ पार्वती ने उस दिव्य शक्ति को आधार प्रदान किया। इसके बाद महादेव ने वरदान दिया कि अब से वे इसी ‘पावन विग्रह’ (ज्योतिर्लिंग) स्वरूप में पूजे जाएंगे। माना जाता है कि पृथ्वी पर महादेव की ऐसी प्रथम पूजा इसी स्थान पर संपन्न हुई थी।
​स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्व
​शं

कराचार्य का योगदान: 8वीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर समूह का कायाकल्प किया था। यहाँ कत्यूरी शैली के 124 मंदिरों का अद्भुत संगम है।

आठवां ज्योतिर्लिंग: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में से आठवां ज्योतिर्लिंग ‘नागेशं दारुकावने’ माना जाता है।
​अखंड ज्योति: मंदिर के गर्भगृह में जल रही अखंड ज्योति शिव की शाश्वत उपस्थिति का प्रतीक है।

​आध्यात्मिक लाभ

​यहाँ स्थित महामृत्युंजय मंदिर विशेष रूप से अकाल कष्टों के निवारण और स्वास्थ्य लाभ के लिए जाना जाता है। साथ ही, शनि और राहु-केतु जनित बाधाओं की शांति के लिए यहाँ किए जाने वाले अनुष्ठान अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।

नोट: यह जानकारी पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। पाठक अपनी श्रद्धा और विवेक के अनुसार इसका अनुसरण करें।