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मोहिनी एकादशी: सनातनी परंपरा , शास्त्र प्रमाण और महूर्त

26अप्रैल 2026

​वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में इसका विशेष स्थान है क्योंकि यह तिथि भगवान विष्णु के एकमात्र स्त्री अवतार ‘मोहिनी’ को समर्पित है।
​1. शास्त्र प्रमाण और पौराणिक कथा
​पद्म पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला, तो असुरों ने उसे छीन लिया। तब देवताओं की सहायता के लिए भगवान विष्णु ने एक अत्यंत सुंदर नारी ‘मोहिनी’ का रूप धारण किया। उन्होंने अपनी माया से असुरों को मोहित कर लिया और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। जिस दिन यह घटना घटी, वह वैशाख शुक्ल एकादशी थी।
​2. ज्योतिषीय योग और उनका प्रभाव
​इस वर्ष मोहिनी एकादशी पर ग्रहों की स्थिति जातकों के लिए विशेष फलदायी है:
​पुनर्वसु नक्षत्र: यह नक्षत्र संतोष और सौभाग्य का प्रतीक है।
​हर्षण योग: इस योग में किए गए कार्य मानसिक प्रसन्नता और सफलता दिलाते हैं।
​प्रभाव: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से चंद्रमा का अशुभ प्रभाव कम होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। विशेषकर जिनकी कुंडली में ‘विष योग’ या ‘ग्रहण दोष’ है, उनके लिए यह व्रत रामबाण है।

​3. महत्व और लाभ

क्षेत्र लाभ
आध्यात्मिक मोह-माया के बंधनों से मुक्ति और वैकुंठ धाम की प्राप्ति।
मानसिक चित्त की चंचलता पर नियंत्रण और एकाग्रता में वृद्धि।
पाप मुक्ति मान्यता है कि इस व्रत से त्रेतायुग में भगवान श्री राम और द्वापर में युधिष्ठिर ने भी लाभ प्राप्त किया था।
शारीरिक उपवास के माध्यम से शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन (विषाक्त पदार्थों की सफाई)।

​मोहिनी एकादशी का व्रत केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धिकरण का मार्ग है।

  1. परंपरा और विधि
    ​दशमी नियम: दशमी की रात्रि से ही सात्विक भोजन ग्रहण करें।
    ​संकल्प: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर भगवान विष्णु (मोहिनी रूप) के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
    ​पूजा: पीले फूल, पंचामृत, तुलसी दल और फल अर्पित करें।
    ​जागरण: रात्रि में भजन-कीर्तन का विशेष महत्व है।
    ​5. वर्तमान समय में उपयोगिता और जरूरत
    ​आज के भागदौड़ भरे युग में मोहिनी एकादशी की प्रासंगिकता और बढ़ गई है:
    ​मानसिक स्वास्थ्य: आज व्यक्ति अवसाद और तनाव से घिरा है। यह व्रत मन को शांत करने और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है।
    ​सत्य और असत्य का बोध: जिस तरह मोहिनी अवतार ने अधर्म (असुरों) पर धर्म की विजय सुनिश्चित की, वैसे ही यह हमें सिखाता है कि बाहरी आकर्षण (माया) क्षणभंगुर है, सत्य केवल ईश्वर है।
    ​संयम का अभ्यास: डिजिटल युग में बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच, एक दिन का पूर्ण संयम हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाता है।
    ​6. समय के साथ लाभ (दीर्घकालिक दृष्टिकोण)
    ​समय बीतने के साथ, जो व्यक्ति नियमित रूप से इस एकादशी का पालन करते हैं, उनके व्यक्तित्व में धैर्य और विवेक का विकास होता है। यह केवल एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित करने की एक पद्धति है।
    ​”मोहिनी एकादशी का व्रत व्यक्ति के पूर्व जन्म के पापों का क्षय कर उसे वर्तमान जीवन में उन्नति और भविष्य में मोक्ष प्रदान करता है।”

मोहिनी एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त
​इस वर्ष वैशाख शुक्ल एकादशी की तिथि को लेकर गणना निम्नलिखित है:
​एकादशी तिथि प्रारंभ: 27 अप्रैल 2026 को दोपहर बाद।
​एकादशी तिथि समाप्त: 28 अप्रैल 2026 को दोपहर तक।
​उदया तिथि: उदया तिथि के अनुसार, 28 अप्रैल 2026 (मंगलवार) को व्रत रखना श्रेष्ठ रहेगा।
​पारण (व्रत तोड़ने) का समय: 29 अप्रैल 2026 को सुबह 05:45 से 08:20 के बीच।
​प्रामाणिक पूजा विधि (Step-by-Step)
​ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सूर्योदय से पूर्व उठकर जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
​संकल्प: मंदिर की सफाई कर दीप प्रज्वलित करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
​कलश स्थापना: एक छोटी चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर कलश स्थापित करें और भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें।
​पंचामृत स्नान: भगवान को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण (पंचामृत) से स्नान कराएं।
​विशेष श्रृंगार: चूँकि यह ‘मोहिनी’ रूप का दिन है, इसलिए भगवान को पीले वस्त्र, चंदन का तिलक और सुगंधित फूल (विशेषकर गेंदा या पीला गुलाब) अर्पित करें।
​तुलसी अर्पण: भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अनिवार्य है। इसके बिना भोग स्वीकार नहीं होता।
​कथा श्रणव: मोहिनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
​आरती और दान: शाम को पुनः दीप दान करें। अगले दिन ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को सामर्थ्य अनुसार दान देकर ही व्रत खोलें।
​कुछ विशेष सावधानियां (Do’s and Don’ts)
​चावल का त्याग: एकादशी के दिन घर में चावल बनाना और खाना पूरी तरह वर्जित माना गया है।
​तुलसी न तोड़ें: एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इसे अशुभ माना जाता है। पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।
​सात्विकता: इस दिन क्रोध, परनिंदा (बुराई) और झूठ बोलने से बचें। मन को शांत और जप में लगाए रखें।
​रात्रि जागरण: संभव हो तो रात में सोएं नहीं, बल्कि विष्णु सहस्रनाम का पाठ या भजन करें।
​विशेष टिप: यदि आप स्वास्थ्य कारणों से निर्जला व्रत नहीं रख सकते, तो एक समय फलाहार (फल, दूध या कुट्टू का आटा) लेकर भी व्रत पूर्ण कर सकते हैं।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय गणनाओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना पहुँचाना है। लोक केसरी न्यूज़ इन तथ्यों की पूर्ण सत्यता का दावा नहीं करता है। किसी भी उपाय या व्रत को करने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ या विद्वान पंडित से सलाह अवश्य लें। लेख में व्यक्त विचार पाठक की निजी आस्था पर निर्भर करते हैं।