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श्री ज्वाला जी – नवरात्र में पूजा के लिए उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

श्री ज्वालामुखी की मान्यता 54 शक्ति पीठों में सर्वोपरि है। भगवती सती के पिता दक्ष प्रजापति ने अपनी राजधानी में किसी समय एक महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं तथा ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया गया। परंतु दक्ष ने शिव जी को उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण न भेजा। उस समय भगवान शिव की अर्धांगिनी सती, अपने पिता दक्ष के न बुलाने पर, पति के विरोध करने पर भी, पिता के घर चली गयी। यज्ञ में अपने पति को न देख कर सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति से कहा कि यह उचित नहीं है। प्रत्युत्तर में पुत्री को अपमानित होना पड़ा। इस प्रकार तिरस्कृत होने पर सती ने यज्ञ की अग्नि में कद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी। सती की देह के आलोक मात्र से भय देने वाली ज्वाला उत्पन्न हुई। सर्वप्रथम आकाश की ओर जाने के पश्चात वह ज्वाला एक पर्वत पर गिरी | यही ज्योति पुंज ज्वालामुखी के नाम से पूजित हुआ, जिसे अन्य पुराणों में भी सफलतादायक कहा गया है।

सती के शरीर से ज्वाला निकल जाने के बाद यंज्ञ की वेदी में योगिनी का केवल दग्ध स्थूल शरीर ही रह गया। इसके पश्चात शिव के वीरभद्र आदि गणों ने उस यज्ञ को क्षण भर में विध्वंस कर दिया। परंतु सती को कंघे पर उठा कर, शिव जी मोहवश, नाना देशों में भ्रमण करने लगे। ऐसी स्थिति देख कर, शिव का मोह दूर-करने हेतु, भगवान विष्णु सती के अंगों को धनुष पर बाण चढ़ा कर काटने लगे। इससे 51 विभिन्न स्थानों पर सती के अंग-प्रत्यंग गिरे | इन्हीं 51 स्थलों पर शिव ने भी अलग-अलग रूप तथा नाम से निवास किया। इन स्थानों को 51 शक्ति पीठ माना जाता है, जिनमें ज्वालामुखी प्रमुख शक्ति पीठ है। यहां पर भगवती सती की महाजिद्दवा गिरी थी। इसकी पुष्टि ‘तंत्र चूड़ामणि’ नामक ग्रंथ से भी होती है। ‘ज्वालामुख्या महाजिह्वा, देव उन्मत्त भैरव; अर्थात ज्वालामुखी में सती महाजीह्वा है और वहां पर श्री शंकर जी उन्मत्त भैरव रूप में स्थित हैं। ज्वालामुखी देवी के दर्शन नौ ज्योतियों के रूप में होते हैं।

ज्वालाजी में नवरात्रि के समय में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। साल के दोनों नवरात्रि यहां पर बडे़ धूमधाम से मनाये जाते है। नवरात्रि में यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दोगुनी हो जाती है। इन दिनों में यहां पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। अखंड देवी पाठ रखे जाते हैं और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हवन इत्यादि की जाती है। नवरात्रि में पूरे भारत वर्ष से श्रद्धालु यहां पर आकर देवी की कृपा प्राप्त करते है। कुछ लोग देवी के लिए लाल रंग के ध्वज भी लाते है।

मंदिर में आरती के समय अद्भूत नजारा होता है। मंदिर में पांच बार आरती होती है। एक मंदिर के कपाट खुलते ही सूर्योदय के साथ में की जाती है। दूसरी दोपहर को की जाती है। आरती के साथ-साथ माता को भोग भी लगाया जाता है। फिर संध्या आरती होती है। इसके पश्चात रात्रि आरती होती है। इसके बाद देवी की शयन शय्या को तैयार किया जाता है। उसे फूलो और सुगंधित सामग्रियों से सजाया जाता है। इसके पश्चात देवी की शयन आरती की जाती है जिसमें भारी संख्या में आये श्रद्धालु भाग लेते है।