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वैकुंठ चतुर्दशी पर चंद्रमा की चौदवीं कला में होगा हरिहर का मिलन, भक्तों को पूजा पाठ से मिलेगा दोहरा लाभ


कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुंठ चतुर्दशी नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह चतुर्दशी रविवार 29 नवंबर को धाता योग और प्रजापति योग में मनाई जाएगी। इस दिन बैकुंठ के अधिपति भगवान विष्णु की पूजा आराधना की जाती है । इसके साथ ही भगवान विष्णु यानी हरी और भगवान शंकर यानी हर महादेव का मिलन भी होता है । बालाजी धाम काली माता मंदिर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित सतीश सोनी के अनुसार बैकुंठ चतुर्दशी कृतिका नक्षत्र के धाता योग प्रजापति योग में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। इस दिन भगवान शिव और विष्णु की पूजा एक साथ की जाती है। इस दिन देश के विभिन्न मंदिरों में विष्णु और शिव के मिलन की पूजा होती है ।चतुर्दशी तिथि चंद्रमा की चौदवीं कला है इसका कला में अमृत का पान भगवान शिव करते हैं ।

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार एक बार विष्णु जी ने काशी विश्वनाथ शिव जी को 1000 स्वर्ण कमल के पुष्प चढ़ाने का संकल्प किया। जब अनुष्ठान का समय आया तब भगवान शिव ने विष्णु जी की परीक्षा के लिए एक पुष्प कम कर दिया ।जिसकी पूर्ति भगवान श्री हरि ने अपने कमलनयन यानी कि अपने नेत्र को मिलाकर की। इस बात से भगवान भूतनाथ शंकर बेहद प्रसन्न हुए और तभी से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जाने जाना लगा और भगवान ने जातकों को को प्रसन्न होकर वचन दिया जो इस दिन व्रत कथा पूजन को करेंगे उसे मेरे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी। इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु को प्रदान किया था तथा इसी दिन सूर्य के द्वार भी खुले रहते हैं । इस दिन व्रत कर तारों की छांव में सरोवर में नदी में घाटों पर वृक्षों पर 14 दीपक जलाने की परंपरा भी है।
28 नवंबर चतुर्थी तिथि सुबह 10:26 से प्रारंभ होकर 29 नवंबर दोपहर 12:30 तक रहेगी यह तिथि सूर्योदय व्यापिनी ग्रहण करनी चाहिए । अतः रविवार को बैकुंठी चतुर्थी तिथि का महान पर्व वैष्णव और शैव को पारंपरिक एकता और भावना के साथ मनाना चाहिए।

संपूर्ण भारत मे भगवान विष्णु व भगवान शंकर बैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान भोलेनाथ व शिव का अभिषेक कर फूलों से श्रृंगार किया जाएगा साथ ही हवन एवं पूजन होगा।

ज्योतिष आचार्य सतीश सोनी