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योग से ही संभव सत्य, प्रेम और अहिंसा: आर्यिका श्री

मुनि की रेती/ अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव के पांचवें दिन आध्यात्म और योग का अनूठा संगम देखने को मिला। जैन परंपरा की आर्यिका श्री 105 पूर्णमति कुंड माता ने अपने प्रेरक उद्बोधन में योग को जीवन की मूल आधारशिला बताते हुए कहा कि सत्य, प्रेम, करुणा और अहिंसा का वास्तविक मार्ग योग से ही प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि जब तक जीवन में सांस है, तब तक योग ही जीवन की सच्चाई है। योग मन को पवित्र और ऊर्जावान बनाता है तथा व्यक्ति को जागरूकता की अवस्था में रखता है। उन्होंने वर्तमान में जीने का संदेश देते हुए कहा कि सच्चा आनंद इसी में निहित है।
आर्यिका पूर्णमति ने बताया कि प्राचीन भारतीय परंपरा में योग और अध्यात्म के माध्यम से ज्ञान की धारा प्रवाहित होती रही है। उन्होंने जीवन में त्याग, दान और विनम्रता को अपनाने पर बल देते हुए कहा कि किए गए पुण्य का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे आत्मिक साधना का हिस्सा बनाना चाहिए।
ऋषिकेश को पवित्र तीर्थ और विश्व की योग राजधानी बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां से योग का संदेश पूरी दुनिया में पहुंच रहा है। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि जीवन में ‘ना तेरा, ना मेरा’ की भावना विकसित कर समाज में प्रेम और प्रकाश फैलाएं।
इस अवसर पर गढ़वाल मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक प्रतीक जैन ने जैन साधना और तपस्या की परंपरा से योग साधकों को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि आर्यिका श्री 105 पूर्णमति कुंड के नेतृत्व में साधकों का दल ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम के लिए पैदल आष्ट्रापद यात्रा पर रवाना हो रहा है, जो लगभग एक माह तक चलेगी।
महोत्सव के दौरान विभिन्न योगाचार्यों ने योग, प्राणायाम, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा की विधियों का अभ्यास कराया। वहीं ‘रन फॉर योग’ कार्यक्रम में बच्चों की उत्साहपूर्ण भागीदारी आकर्षण का केंद्र रही। सायंकालीन सत्र में भजन-कीर्तन संध्या ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
कार्यक्रम के सफल संचालन में आयोजन समिति और विभिन्न सहयोगियों की सक्रिय भूमिका रही।