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उत्तराखंड संस्कृति की पहचान टोपी/ टोपला – डॉ सुनील दत्त थपलियाल

ऋषिकेश 14 दिसंबर 2020
ऋषिकेश के जाने-माने कवि एवं शिक्षक डॉ सुनील दत थपलियाल ने उत्तराखंडी टोपी की महत्ता को बताया ! डॉ सुनील दत थपलियाल ने कहा की सदियों से उत्तराखंड की संस्कृति में टोपी का अपना महत्वपूर्ण स्थान है जो मान सम्मान का प्रतीक मानी जाती है! अनादिकाल से ही टोपी पहनने की परम्परा उत्तराखंड की संस्कृति में है,
माना जाता है कि टोपी पुराने समय में बहुत बड़े-बड़े विवादों को निपटाने का काम करती थी यहां तक की गरीबी के दिनों में जब किसी साहूकार से कर्ज लिया जाता था यदि समय पर जमा नहीं किया तो कर्ज लेने वाला साहूकार के पैर में टोपी रखकर कुछ दिन का और समय ले लेता था बेटियों की शादियों में यदि दहेज पूरा नहीं हुआ तो बेटी का बाप अपने समधी के पैर में टोपी रखकर समस्या का समाधान कर देता था, समय के बदलने के साथ-साथ इसमें भी परिवर्तन आ गया है आने वाली पीढ़ी को टोपी की संस्कृति के बारे में कुछ भी पता नहीं है इसे बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए।


उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी है जो कि पुराने समय में गांवों से लेकर शहर तक पहनी जाती थी। जिसमें कि कोट या वास्केट के बचे कैप से ही उसी कलर की टोपी निर्मित की जाती थी। लेकिन बदलते दौर में यहां की संस्कृति की प्रतीक रही टोपी अब लोगों की पहुंच से दूर हो गई है
टोपी का भी अपना इतिहास है. क्षेत्र व समुदाय से लेकर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए भी टोपी पहनने का रिवाज रहा है. बाॅलीवुड से लेकर कविता हो या शायरी या फिर मुहावरा, टोपी कहीं नहीं छूटी है. हर जगह दमदार उपस्थिति है टोपी की. उत्तराखंड में भी खास तरह की टोपी पहनने की परंपरा रही है, लेकिन पड़ोसी राज्य हिमाचल की तरह कोई पहचान नहीं बन सकी है. अक्सर बुजुर्ग सफेद या काली टोपी पहने दिख जाते हैं. माना जाता है कि 18वीं सदी से उत्तराखंड में टोपी पहनने का प्रचलन बढ़ा. इसलिए यह सोचा गया कि क्यों न इसे आधुनिक रूप देकर युवाओं और दुनिया के सामने फिर पेश किया जाए जिसको पर्यटक स्थानीय स्मृति भेंट के रूप में ले जा सकता है। यहां आने वाले पर्यटकों के साथ हर अतिथि को पुष्पगुच्छ देने की बजाय ब्रह्मकमल के ब्रोच वाली आधुनिक पारंपरिक टोपी दी जानी चाहिए जो यहां की संस्कृति की आधारभूत पहचान है। जिससे मेहमानों का सम्मान व संस्कृति की पहचान बन सके