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भस्म हो गए थे पाप जब विष्णु ने धरा मोहिनी रूप: पढ़िए समुद्र मंथन की वो अनसुनी गाथा”

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समुद्र मंथन और अमृत की रक्षा की पौराणिक गाथा
​पौराणिक ग्रंथों (श्रीमद्भागवत पुराण और पद्म पुराण) के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तो अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत को देखते ही असुरों में उसे पाने की होड़ मच गई और वे बलपूर्वक कलश छीनकर भागने लगे।
​असुरों को अमर होने से रोकने और सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने एक मायावी चाल चली। उन्होंने एक अत्यंत रूपवती और मनमोहक स्त्री का रूप धारण किया, जिसे ‘मोहिनी’ कहा गया।
​मोहिनी का रूप और असुरों का सम्मोहन
​मोहिनी का रूप इतना दिव्य और आकर्षक था कि क्रूर असुर भी अपनी सुध-बुध खो बैठे। मोहिनी ने अपनी मधुर वाणी और मुस्कान से असुरों को मोहित कर लिया। असुरों ने स्वयं ही अमृत का कलश मोहिनी को सौंप दिया और उनसे न्यायपूर्वक अमृत बांटने का आग्रह किया।
​देवताओं को अमृत पान
​मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया। अपनी माया से उन्होंने असुरों को भ्रमित रखा और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। जब तक असुरों को वास्तविकता का आभास हुआ, तब तक देवता अमर हो चुके थे।
​इस कथा का आध्यात्मिक संदेश (News Perspective)
​यह पौराणिक घटना केवल एक कहानी नहीं बल्कि जीवन का गहरा दर्शन है:
​अधर्म पर धर्म की विजय: यह कथा सिखाती है कि बुद्धि और विवेक के प्रयोग से बड़ी से बड़ी विपत्ति और आसुरी शक्तियों को हराया जा सकता है।
​माया का प्रभाव: मोहिनी रूप संसार की उस ‘माया’ का प्रतीक है जो मनुष्य को सत्य के मार्ग से भटका देती है। एकादशी का व्रत इसी माया से मुक्त होने का संकल्प है।
​स्त्री शक्ति का सम्मान: भगवान विष्णु ने संसार को बचाने के लिए स्त्री रूप को ही सबसे शक्तिशाली माध्यम चुना।

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अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय गणनाओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना पहुँचाना है। लोक केसरी न्यूज़ इन तथ्यों की पूर्ण सत्यता का दावा नहीं करता है। किसी भी उपाय या व्रत को करने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ या विद्वान पंडित से सलाह अवश्य लें। लेख में व्यक्त विचार पाठक की निजी आस्था पर निर्भर करते हैं।