देवभूमि उत्तराखंड: मां दुर्गा, पार्वती और शक्ति परंपरा की पौराणिक धरती
Lok Kesari News
देहरादून।25 मार्च 2026
उत्तराखंड को प्राचीन ग्रंथों में देवभूमि कहा गया है। स्कंद पुराण के केदारखण्ड और मानसखण्ड, शिव पुराण तथा देवी भागवत में हिमालय क्षेत्र को देवी-शक्ति का पवित्र निवास बताया गया है। मान्यता है कि यहीं पर्वतराज हिमालय और माता मेना के घर माता पार्वती का जन्म हुआ, इसलिए उन्हें हिमाद्रि पुत्री, गिरिजा और उमा के नाम से भी जाना जाता है।

त्रिजुगीनारायण मंदिर
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय के केदारखण्ड क्षेत्र में कठोर तपस्या की। उन्होंने वर्षों तक फल और पत्तों का त्याग कर घोर साधना की, जिसके कारण उन्हें अपर्णा भी कहा गया। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने विवाह के लिए सहमति दी।

चंद्रबदनी मंदिर
स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है कि रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। इस विवाह में भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई बनकर कन्यादान किया और ब्रह्मा ने यज्ञ कराया। मंदिर परिसर में स्थित अखंड अग्निकुंड को उसी विवाह की अग्नि माना जाता है, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।

उत्तराखंड में देवी-शक्ति की उपासना अनेक रूपों में दिखाई देती है। टिहरी जनपद स्थित सुरकंडा देवी और चंद्रबदनी देवी मंदिरों को शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि सती के अंग यहां गिरे थे। वहीं श्रीनगर गढ़वाल स्थित धारी देवी मंदिर को प्रदेश की रक्षक देवी माना जाता है। अलकनंदा नदी के मध्य चट्टान पर स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है।

धारी देवी मंदिर
कुमाऊं क्षेत्र में नंदा देवी को माता पार्वती का ही रूप माना जाता है। अल्मोड़ा और चमोली में नंदा देवी की विशेष पूजा होती है। हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा को हिमालय की सबसे कठिन और पवित्र यात्राओं में गिना जाता है। लोक परंपरा में इसे पार्वती की मायके से कैलाश की विदाई यात्रा माना जाता है।
इसी प्रकार नैना देवी (नैनीताल), ज्वाल्पा देवी (पौड़ी), हाट कालिका (पिथौरागढ़), पूर्णागिरी (टनकपुर), कालीमठ और कोटेश्वरी जैसे अनेक मंदिर उत्तराखंड की समृद्ध शक्ति परंपरा को दर्शाते हैं। इन मंदिरों में वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, जबकि नवरात्र के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और मेले आयोजित होते हैं।
धार्मिक ग्रंथों और लोक आस्था के अनुसार हिमालय क्षेत्र को देवी-शक्ति की तपोभूमि माना गया है। यही कारण है कि उत्तराखंड में देवी उपासना केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
दे
वभूमि की यही पौराणिक विरासत आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती है तथा हिमालय की गोद में बसे इन शक्तिस्थलों को आध्यात्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती है।
यह पोस्ट धार्मिक आस्था एवं मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी साझा करना है।

